सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या घटने को अक्सर संसाधनों की कमी से जोड़ा जाता है। लेकिन चम्पावत के सीमांत इलाके का एक स्कूल इस धारणा को गलत साबित कर रहा है। भारत-नेपाल सीमा से सटे पासम गांव के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में तीन साल में छात्रों की सं

साल 2023 में जहां स्कूल में 23 बच्चे पढ़ते थे, वहीं 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 52 से ज्यादा पहुंच गया। इस बदलाव के पीछे विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक और विज्ञान शिक्षक नरेश चंद्र जोशी की कार्यशैली को अहम माना जा रहा है।

उन्होंने पढ़ाई को सिर्फ किताब और ब्लैकबोर्ड तक सीमित रखने की बजाय बच्चों को प्रयोग, डिजिटल माध्यम, खेल और प्रतियोगिताओं से जोड़ा। साथ ही अभिभावकों से लगातार बात करके उन्हें बच्चों की पढ़ाई और स्कूल की गतिविधियों से भी जोड़ा।

छात्र संख्या में लगातार बढ़ोतरी इसका सबसे साफ नतीजा है। 2024 में विद्यालय में 36 विद्यार्थी थे, जो 2025 में बढ़कर 41 और 2026 में 52 से ज्यादा हो गए। इसी साल स्कूल को हाईस्कूल स्तर तक अपग्रेड भी किया गया।

इसका सीधा फायदा सीमांत क्षेत्र के छात्रों को मिलेगा। पहले उन्हें आठवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे इलाकों में जाना पड़ता था। स्कूल के छात्रों की उपलब्धियां भी इस बदलाव को दिखाती हैं। इस साल तीन छात्रों ने जवाहर नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल की।

इसके अलावा बच्चे साइंस ओलंपियाड, मुख्यमंत्री मेधावी छात्रवृत्ति और खेल प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा ले रहे हैं। विद्यालय में स्मार्ट डिजिटल बोर्ड और स्मार्ट टीवी जैसे संसाधनों का इस्तेमाल पढ़ाई को ज्यादा बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है।

विज्ञान शिक्षक के तौर पर जोशी की गतिविधियां सिर्फ इसी विद्यालय तक सीमित नहीं है। जिला विज्ञान समन्वयक और मास्टर ट्रेनर के रूप में वे अन्य शिक्षकों के साथ भी अपने अनुभव बांटते हैं। नरेश चंद्र जोशी को शिक्षा के क्षेत्र में नए तरीकों के लिए साल 2024 में शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार मिला है। पासम का उदाहरण दिखाता है कि सरकारी स्कूल में बदलाव सिर्फ संसाधनों से नहीं होता।