उत्तराखंड में राजधानी को लेकर जारी बहस के बीच 15वें वित्त आयोग को सौंपे गए राज्य सरकार के ज्ञापन से खर्च और प्रशासनिक ढांचे से जुड़े सवाल सामने आए हैं। सरकार ने राजधानी से संबंधित बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए कुल 1,000 करोड़ रुपए की सहायता मांगी थी।

ज्ञापन में देहरादून के विधानसभा-सचिवालय परिसर और संबंधित भवनों के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रस्ताव था। गैरसैंण में मिनी सचिवालय, ट्रांजिट हॉस्टल और अन्य भवनों के निर्माण के लिए 250 करोड़ रुपए मांगे गए थे। यानी दोनों स्थानों पर राजधानी से जुड़ी सुविधाएं विकसित करने की जरूरत बताई गई थी।

हालांकि, यह रकम सहायता के लिए रखा गया प्रस्ताव थी। इसे स्वीकृत बजट या सरकार की ओर से खर्च की गई राशि नहीं माना जा सकता। उपलब्ध जानकारी से यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन प्रस्तावों के तहत कितनी राशि मंजूर हुई और परियोजनाओं पर वास्तव में कितना खर्च हुआ।

देहरादून में नए परिसर की जरूरत क्यों बताई गई

उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था। गठन के बाद देहरादून को अंतरिम राजधानी बनाया गया। शुरुआत में सचिवालय शिक्षा विभाग की खाली इमारत में चलाया गया था। बाद में परिसर का विस्तार और मरम्मत हुई, लेकिन प्रशासनिक काम बढ़ने के साथ जगह की कमी बनी रही।

ज्ञापन में बताया गया था कि सचिवालय राजपुर रोड के व्यस्त क्षेत्र में है। विधानसभा का अस्थायी भवन सचिवालय से कुछ किलोमीटर दूर स्थित है। प्रशासनिक कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए रायपुर क्षेत्र में नया विधानसभा-सचिवालय परिसर बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।

इस प्रस्ताव में मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के आवास बनाने की बात भी शामिल थी। परियोजना के लिए 500 करोड़ रुपए की सहायता मांगी गई थी। प्रस्तावित परिसर के लिए वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया का भी जिक्र किया गया था।

गैरसैंण में किन सुविधाओं का प्रस्ताव था

गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किए जाने के बाद भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन बनाया गया। यहां विधानसभा सत्र भी आयोजित किए जाते हैं। इसके बावजूद सरकार ने गैरसैंण में प्रशासनिक सुविधाओं की कमी का हवाला दिया था।

ज्ञापन में मिनी सचिवालय, ट्रांजिट हॉस्टल और अन्य भवनों के निर्माण के लिए 250 करोड़ रुपए की सहायता मांगी गई थी। सरकार ने गैरसैंण को गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के लगभग मध्य में स्थित बताया था। साथ ही वहां रेल और हवाई संपर्क नहीं होने की बात भी रखी गई थी।

इन सुविधाओं का उद्देश्य विधानसभा सत्रों के संचालन और राजधानी से जुड़े बुनियादी ढांचे को मजबूत करना था। केवल भवन तैयार होने से नियमित प्रशासनिक गतिविधियां शुरू नहीं होतीं। इसके लिए कर्मचारियों की तैनाती, अधिकारियों के कार्यालय, आवास, परिवहन और दूसरी जरूरी व्यवस्थाएं भी चाहिए होती हैं।

असली खर्च जानने के लिए किन आंकड़ों की जरूरत

राजधानी से जुड़ी व्यवस्थाओं पर कुल खर्च का आकलन केवल सहायता की मांग देखकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए देहरादून और गैरसैंण में भवन निर्माण तथा बुनियादी ढांचे पर हुए वास्तविक खर्च का विवरण जरूरी है।

इसके अलावा कर्मचारियों और अधिकारियों की तैनाती, आवास, परिवहन तथा अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं का सालाना खर्च भी सामने आना चाहिए। यह जानकारी भी जरूरी है कि प्रस्तावित परियोजनाओं में से कितनी पूरी हुईं और उनसे प्रशासनिक कामकाज में क्या बदलाव आया।

इन आंकड़ों के बिना दोनों स्थानों पर विकसित की जा रही व्यवस्थाओं को पूरी तरह अतिरिक्त बोझ या पूरी तरह उपयोगी बताना अधूरा आकलन होगा। यही विवरण यह समझने में मदद करेगा कि अब तक किए गए निवेश का प्रशासनिक लाभ कितना रहा और आगे किन सुविधाओं की जरूरत है।

गैरसैंण के समर्थन में क्षेत्रीय संतुलन का तर्क

गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल रही। इसके समर्थकों का तर्क है कि पहाड़ में राजधानी होने से पर्वतीय जिलों की शासन तक पहुंच आसान हो सकती है। सरकारी गतिविधियां बढ़ने से स्थानीय रोजगार, कारोबार और बुनियादी सुविधाओं को भी गति मिलने की उम्मीद जताई जाती है।

उत्तराखंड में देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे क्षेत्रों में प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधियां अपेक्षाकृत अधिक केंद्रित हैं। इसके मुकाबले दूरस्थ पर्वतीय इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और परिवहन से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसलिए गैरसैंण को मजबूत प्रशासनिक केंद्र बनाने की मांग क्षेत्रीय संतुलन से भी जुड़ी है।

हालांकि, केवल राजधानी को पहाड़ में स्थापित करने से पलायन और बेरोजगारी जैसी समस्याएं खत्म नहीं होंगी। इसके लिए सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और रोजगार के अवसरों में भी निवेश की जरूरत होगी। गैरसैंण में नियमित सरकारी गतिविधियां कितनी बढ़ती हैं, इसका असर इन सुविधाओं पर निर्भर करेगा।

फैसला केवल भवनों की लागत से नहीं होगा

देहरादून में सचिवालय, विभागीय कार्यालय, अधिकारियों के आवास और दूसरी प्रशासनिक सुविधाएं पहले से मौजूद हैं। इन्हें पूरी तरह गैरसैंण स्थानांतरित करने के लिए नए कार्यालय, आवास, परिवहन और अन्य सुविधाओं पर बड़ा निवेश करना पड़ेगा।

इसके साथ कर्मचारियों और अधिकारियों की तैनाती तथा रोजमर्रा के प्रशासनिक कामकाज को नए सिरे से व्यवस्थित करना होगा। इसलिए राजधानी से जुड़ा फैसला केवल भवन निर्माण की लागत देखकर नहीं किया जा सकता। मौजूदा परिसंपत्तियों के इस्तेमाल, स्थानांतरण की लागत और लंबे समय के प्रशासनिक लाभ का भी आकलन जरूरी होगा।

एक स्थायी राजधानी होने पर विभागों और कर्मचारियों का कामकाज एक जगह केंद्रित किया जा सकता है। इससे 2 स्थानों पर समान सुविधाएं बनाए रखने की जरूरत कम हो सकती है। दूसरी ओर, पर्वतीय राज्य में शासन की पहुंच और क्षेत्रीय संतुलन भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

निष्कर्ष

15वें वित्त आयोग को दिए गए ज्ञापन में देहरादून और गैरसैंण की राजधानी-संबंधी सुविधाओं के लिए कुल 1,000 करोड़ रुपए की सहायता मांगी गई थी। उपलब्ध जानकारी में मंजूर रकम और वास्तविक खर्च स्पष्ट नहीं है। इसलिए आगे की बहस के लिए परियोजनावार खर्च, सालाना संचालन लागत और पूरा हुए काम का विवरण जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. उत्तराखंड सरकार ने कुल कितनी सहायता मांगी थी?

सरकार ने राजधानी से जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कुल 1,000 करोड़ रुपए की सहायता मांगी थी।

Q. देहरादून के लिए कितनी राशि प्रस्तावित थी?

देहरादून में विधानसभा-सचिवालय परिसर और संबंधित भवनों के लिए 500 करोड़ रुपए प्रस्तावित थे।

Q. गैरसैंण के लिए कितनी राशि मांगी गई थी?

गैरसैंण में मिनी सचिवालय, ट्रांजिट हॉस्टल और अन्य भवनों के लिए 250 करोड़ रुपए मांगे गए थे।

Q. क्या 1,000 करोड़ रुपए मंजूर या खर्च हो चुके हैं?

उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी राशि मंजूर हुई या परियोजनाओं पर वास्तव में कितना खर्च किया गया।

Q. देहरादून में नए परिसर का प्रस्ताव क्यों रखा गया था?

ज्ञापन में सचिवालय की जगह की कमी और सचिवालय तथा विधानसभा भवन के अलग-अलग स्थानों पर होने का उल्लेख किया गया था।

Q. गैरसैंण में किन सुविधाओं की कमी बताई गई थी?

गैरसैंण में मिनी सचिवालय, ट्रांजिट हॉस्टल और अन्य प्रशासनिक भवनों की जरूरत बताई गई थी।