अल्मोड़ा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में मानसिक तनाव के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज से जुड़े बेस अस्पताल के मनोरोग विभाग में रोजाना 40 से अधिक मरीज मानसिक दिक्कतों के साथ पहुंच रहे हैं। इनमें 15 से 20 मरीज युवा होते हैं।

4 नवंबर को राष्ट्रीय तनाव जागरूकता दिवस से पहले स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि मानसिक तनाव अब केवल महानगरों या बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। पहाड़ी इलाकों में भी लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं।

युवाओं पर पढ़ाई और कॅरिअर का दबाव

अल्मोड़ा जैसे पहाड़ी जिले में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और कॅरिअर बनाने के दबाव से जूझ रहे हैं। लगातार मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिलने पर कई युवाओं में निराशा, चिंता और तनाव की स्थिति बन सकती है। रोजगार की चिंता और बदलती जीवनशैली भी इस परेशानी को बढ़ा रही है।

मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल, अनियमित दिनचर्या और पर्याप्त नींद नहीं लेना भी मानसिक दबाव से जुड़े कारणों में शामिल हैं। सामाजिक संवाद की कमी से लोगों का भावनात्मक सहारा कमजोर पड़ सकता है।

पलायन से गांवों में बढ़ा अकेलापन

पलायन के कारण कई बुजुर्ग गांवों में अकेले रह रहे हैं। ऐसे बुजुर्ग अकेलेपन और भावनात्मक परेशानी से जूझ रहे हैं। परिवार और दोस्तों से बातचीत कम होना उनकी मानसिक स्थिति पर असर डाल सकता है।

मानसिक तनाव के शुरुआती संकेतों में लगातार उदास रहना, छोटी-छोटी बातों पर घबराना, नींद न आना और चिड़चिड़ापन शामिल हैं। किसी काम में मन न लगना और बार-बार नकारात्मक विचार आना भी संकेत हो सकते हैं।

हर तनाव डिप्रेशन नहीं होता, लेकिन लंबे समय तक बनी रहने वाली परेशानी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे संकेत दिखने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।

दिनचर्या में बदलाव से मिल सकती है मदद

तनाव कम करने के लिए नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद और रोज कुछ समय टहलना उपयोगी हो सकता है। योग, प्राणायाम और ध्यान को दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दी गई है। मोबाइल का अनावश्यक इस्तेमाल कम करना भी मददगार हो सकता है।

परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत के लिए समय निकालना भी जरूरी है। मानसिक परेशानी को छिपाने या अकेले सहने के बजाय विशेषज्ञ से मदद लेने पर जोर दिया गया है।

बेस अस्पताल अल्मोड़ा की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट प्रियंका बोनाल ने कहा कि मानसिक परेशानी होने पर मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से मदद लेना सामान्य बात है। उन्होंने कहा कि मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि खुद का ख्याल रखने की समझदारी है।

निष्कर्ष

अल्मोड़ा में मानसिक परेशानियों के साथ अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी चिंता का विषय है। युवाओं पर कॅरिअर और रोजगार का दबाव, जबकि बुजुर्गों में अकेलापन प्रमुख चुनौतियां हैं। शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय पर विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. अल्मोड़ा के बेस अस्पताल में रोज कितने मरीज मानसिक परेशानी के साथ पहुंच रहे हैं?

रोजाना 40 से अधिक मरीज मानसिक दिक्कतों के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं।

Q. इनमें युवा मरीजों की संख्या कितनी है?

इन मरीजों में 15 से 20 युवा शामिल होते हैं।

Q. युवाओं में तनाव के प्रमुख कारण क्या बताए गए हैं?

प्रतियोगी परीक्षाओं, कॅरिअर और रोजगार की चिंता के साथ सफलता नहीं मिलने का दबाव तनाव बढ़ा सकता है।

Q. गांवों में बुजुर्ग किन परेशानियों से जूझ रहे हैं?

पलायन के कारण कई बुजुर्ग गांवों में अकेले रह रहे हैं और अकेलेपन व भावनात्मक परेशानी का सामना कर रहे हैं।

Q. मानसिक तनाव के शुरुआती संकेत कौन से हैं?

लगातार उदासी, घबराहट, नींद न आना, चिड़चिड़ापन, काम में मन न लगना और नकारात्मक विचार इसके संकेत हो सकते हैं।

Q. तनाव कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?

नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, टहलना, योग, प्राणायाम, ध्यान और परिवार के साथ बातचीत मददगार हो सकती है।

Q. मानसिक परेशानी होने पर किससे मदद लेनी चाहिए?

मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से सलाह ली जा सकती है।