उत्तराखंड के 4 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों के कार्यबहिष्कार से मरीजों को इलाज के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। देहरादून, हल्द्वानी, अल्मोड़ा और श्रीनगर में करीब 600 डॉक्टर स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। इसका असर ओपीडी और पहले से तय नियमित ऑपरेशन पर पड़ा है।

हल्द्वानी स्थित राजकीय मेडिकल कॉलेज से जुड़े सुशीला तिवारी अस्पताल में आंदोलन सोमवार को छठे दिन भी जारी रहा। अस्पताल में परामर्श और जांच के लिए पहुंचे कई मरीजों को परेशानी हुई। कुछ मरीजों को डॉक्टर से मिलने के लिए इंतजार करना पड़ा, जबकि तय तारीख पर सर्जरी कराने पहुंचे लोगों को आगे की तारीख दी गई।

कुमाऊं के मरीजों पर सीधा असर

सुशीला तिवारी अस्पताल कुमाऊं का प्रमुख सरकारी अस्पताल है। यहां नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत और आसपास के पहाड़ी इलाकों से मरीज इलाज कराने आते हैं। इसलिए नियमित सेवाओं में आई रुकावट का असर दूर-दराज से पहुंचे मरीजों और उनके तीमारदारों पर भी पड़ रहा है।

अस्पताल की सामान्य व्यवस्था में ओपीडी सबसे ज्यादा प्रभावित बताई जा रही है। नियमित ऑपरेशन भी कई जगह तय कार्यक्रम के अनुसार नहीं हो पा रहे हैं। इससे पहले से इलाज की योजना बनाकर पहुंचे मरीजों को अपनी सर्जरी के लिए नई तारीख का इंतजार करना पड़ रहा है।

₹1 लाख मासिक स्टाइपेंड की मांग

हड़ताल कर रहे डॉक्टरों के अनुसार, उत्तराखंड में उनके स्टाइपेंड में पिछले 10 साल से बढ़ोतरी नहीं हुई है। उन्हें फिलहाल करीब ₹62 हजार प्रतिमाह मिल रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी जिम्मेदारियों, काम के दबाव और प्रशिक्षण से जुड़े खर्च के मुकाबले यह रकम कम है।

रेजिडेंट डॉक्टर स्टाइपेंड को बढ़ाकर कम से कम ₹1 लाख प्रतिमाह करने की मांग कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि कई दूसरे राज्यों में पीजी डॉक्टरों को इससे अधिक मानदेय दिया जा रहा है।

इमरजेंसी सेवाएं जारी रखने की बात

डॉक्टरों ने कहा है कि मरीजों को तत्काल इलाज से वंचित न होना पड़े, इसलिए इमरजेंसी सेवाओं को हड़ताल से अलग रखा गया है। हालांकि ओपीडी और नियमित ऑपरेशन प्रभावित होने से अस्पतालों की रोजमर्रा की व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है।

पीजी डॉक्टरों से पहले इंटर्न डॉक्टरों का प्रदर्शन हुआ था। अब नर्सिंग और पैरामेडिकल छात्रों की ओर से भी स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा है। इन घटनाक्रमों से मेडिकल कॉलेजों में स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और बढ़ गया है।

चारों सरकारी मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टर अपनी मांग पर कायम हैं। उनका कहना है कि ठोस आश्वासन मिलने तक आंदोलन जारी रहेगा। दूसरी ओर, मरीजों को उम्मीद है कि डॉक्टरों और सरकार के बीच जल्द सहमति बनेगी, ताकि ओपीडी और नियमित ऑपरेशन की व्यवस्था सामान्य हो सके।

निष्कर्ष

स्टाइपेंड को लेकर जारी कार्यबहिष्कार का सबसे स्पष्ट असर सामान्य इलाज और तय ऑपरेशन पर दिख रहा है। इमरजेंसी सेवाएं जारी रखने की बात कही गई है, लेकिन समाधान होने तक मरीजों को ओपीडी और सर्जरी में देरी का सामना करना पड़ सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. उत्तराखंड में कितने पीजी डॉक्टर हड़ताल पर हैं?

4 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में करीब 600 पीजी रेजिडेंट डॉक्टर कार्यबहिष्कार कर रहे हैं।

Q. डॉक्टर किन मेडिकल कॉलेजों में आंदोलन कर रहे हैं?

आंदोलन देहरादून, हल्द्वानी, अल्मोड़ा और श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में चल रहा है।

Q. हड़ताल की मुख्य मांग क्या है?

डॉक्टर स्टाइपेंड बढ़ाकर कम से कम ₹1 लाख प्रतिमाह करने की मांग कर रहे हैं।

Q. अभी डॉक्टरों को कितना स्टाइपेंड मिल रहा है?

डॉक्टरों के अनुसार, उन्हें फिलहाल करीब ₹62 हजार प्रतिमाह स्टाइपेंड मिलता है।

Q. सुशीला तिवारी अस्पताल में हड़ताल कब से चल रही है?

अस्पताल में पीजी डॉक्टरों का कार्यबहिष्कार सोमवार को लगातार छठे दिन भी जारी रहा।

Q. हड़ताल से अस्पताल की कौन-सी सेवाएं प्रभावित हुई हैं?

ओपीडी और कई नियमित ऑपरेशन प्रभावित हुए हैं। मरीजों को परामर्श, जांच और सर्जरी के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।

Q. क्या इमरजेंसी सेवाएं भी बंद हैं?

डॉक्टरों का कहना है कि इमरजेंसी सेवाओं को हड़ताल से अलग रखा गया है।