उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल में धरातलीय ओजोन का स्तर बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंचने का मामला सामने आया है। 19 दिसंबर 2025 को यहां एक घंटे के दौरान ओजोन की मात्रा 880 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज की गई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यह दिल्ली में दर्ज 440 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के स्तर से लगभग दोगुना है।

श्रीनगर पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित शहर है। यह बदरीनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा के रास्ते का अहम पड़ाव भी माना जाता है। पहाड़ी इलाकों को आमतौर पर साफ हवा से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन ताजा निगरानी आंकड़ों ने इस धारणा के सामने प्रदूषण की गंभीर तस्वीर रखी है।

लगातार निगरानी से सामने आया आंकड़ा

श्रीनगर गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग ने वायु गुणवत्ता पर निगरानी की। विभाग ने 15 सितंबर 2025 से 16 सितंबर 2026 तक जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया। ये निष्कर्ष मंगलवार को ओजोन दिवस के मौके पर जारी किए गए।

निगरानी से जुड़े प्रोफेसर डॉ. आलोक गौतम ने ओजोन में अचानक आए उछाल को गंभीर अध्ययन का विषय बताया। अध्ययन में शामिल वैज्ञानिक डॉ. त्रिलोक चंद उपाध्याय के मुताबिक, जंगलों की आग से निकलने वाली गैसें और महीन कण वातावरण में पहुंचते हैं। इससे ओजोन बढ़ने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकता है।

वाहनों और दूसरे दहन स्रोतों से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड भी इस रासायनिक प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों ने शुरुआती तौर पर जंगलों की आग को ओजोन बढ़ने का सबसे बड़ा संभावित कारण माना है। हालांकि, इस निष्कर्ष को समझने के लिए आगे विस्तृत अध्ययन की जरूरत बताई गई है।

राष्ट्रीय सीमा से 6 गुना से ज्यादा औसत

श्रीनगर में ओजोन का 8 घंटे का रोलिंग औसत 634.13 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 8 घंटे की राष्ट्रीय सीमा 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इस तुलना में श्रीनगर का औसत तय सीमा से 6 गुना से अधिक रहा।

कुल 339 दिनों के रिकॉर्ड की समीक्षा में 26 दिन ऐसे मिले, जब 8 घंटे का औसत राष्ट्रीय मानक से ऊपर था। यह कुल निगरानी अवधि के करीब 7.7% दिन हैं। आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल एक दिन के असामान्य उछाल तक सीमित नहीं रही।

घाटी की भौगोलिक स्थिति भी अहम

श्रीनगर की भौगोलिक बनावट और मौसम प्रदूषण के जमा होने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सर्दियों में जमीन के पास ठंडी हवा और उसके ऊपर गर्म हवा की परत बनती है। ऐसी स्थिति में प्रदूषक ऊपर की ओर फैल नहीं पाते और घाटी में ही ठहर सकते हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों में देश का पिछला सबसे ऊंचा धरातलीय ओजोन स्तर 472 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बताया गया था। यह रिकॉर्ड 19 मई 2025 को दिल्ली के सीआरआरआई-मथुरा रोड स्टेशन पर 8 घंटे के औसत में दर्ज हुआ था। श्रीनगर का 880 से अधिक का आंकड़ा एक घंटे के माप से जुड़ा है, इसलिए दोनों आंकड़ों की समय-अवधि अलग है।

निष्कर्ष

श्रीनगर में ओजोन का एक घंटे का स्तर 880 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर जाना गंभीर वायु गुणवत्ता संकेत है। उपलब्ध अध्ययन में जंगलों की आग, दहन स्रोत और घाटी में प्रदूषण के ठहराव को संभावित वजहों के रूप में चिन्हित किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. श्रीनगर में ओजोन का सबसे ऊंचा स्तर कब दर्ज हुआ?

19 दिसंबर 2025 को एक घंटे के दौरान ओजोन का स्तर 880 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज हुआ।

Q. श्रीनगर में ओजोन का 8 घंटे का औसत कितना रहा?

8 घंटे का रोलिंग औसत 634.13 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया।

Q. ओजोन की राष्ट्रीय सीमा कितनी है?

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, 8 घंटे के लिए राष्ट्रीय सीमा 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है।

Q. अध्ययन में ओजोन बढ़ने की कौन-सी वजहें बताई गई हैं?

जंगलों की आग, वाहनों और अन्य दहन स्रोतों से निकलने वाली गैसों को संभावित वजहों में शामिल किया गया है।

Q. श्रीनगर की भौगोलिक स्थिति का क्या असर पड़ता है?

सर्दियों में ठंडी और गर्म हवा की परत बनने पर प्रदूषक घाटी से बाहर नहीं फैल पाते। इससे वे स्थानीय स्तर पर जमा हो सकते हैं।

Q. कितने दिनों में ओजोन राष्ट्रीय मानक से ऊपर रहा?

339 दिनों के विश्लेषण में 26 दिन 8 घंटे का औसत राष्ट्रीय मानक से अधिक रहा।