उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। जंगली जानवर प्राकृतिक आवास से निकलकर रिहाइशी इलाकों और गांवों के करीब पहुंच रहे हैं। नैनीताल जिले से लगे तराई सेंट्रल वन प्रभाग में गुलदारों की मौजूदगी ने ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बढ़ा दी है।
राज्य में गुलदारों की पिछली गणना वर्ष 2022 में हुई थी। उस गणना में इनकी संख्या 3,115 दर्ज की गई थी। इस वर्ष फिर से गणना प्रस्तावित है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुकूल माहौल के कारण इस बार गुलदारों की संख्या बढ़ सकती है।
गुलदारों की बढ़ती संख्या और सुरक्षित वन क्षेत्र की कमी को इस समस्या की बड़ी वजहों में माना जा रहा है। जंगलों में शिकार की कमी भी गुलदारों को आबादी के करीब ला रही है। इसके चलते उत्तराखंड में गुलदार मानव बस्तियों के लिए गंभीर खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं।
2000 के बाद 567 लोगों की मौत
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से अब तक गुलदारों के हमलों में 567 लोगों की जान जा चुकी है। यह संख्या इस अवधि में वन्यजीवों के हमलों से हुई कुल मौतों का करीब 44 प्रतिशत बताई गई है।
गुलदार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की शेड्यूल-1 श्रेणी में शामिल है। इस श्रेणी के वन्यजीवों को कानून के तहत सर्वोच्च संरक्षण मिलता है। संरक्षण मिलने से गुलदारों की संख्या बढ़ी है, लेकिन इनकी आबादी को संतुलित रखने के लिए किसी ठोस दीर्घकालिक योजना की कमी बताई जा रही है।
आबादी से सटे जंगलों में विभाग की निगरानी
तराई सेंट्रल वन प्रभाग नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिलों से सटा है। इस क्षेत्र में कई गांव सीधे जंगलों की सीमा से जुड़े हैं। ऐसे इलाकों में गुलदारों के छिपने और आबादी के करीब आने का खतरा बना रहता है।
तराई सेंट्रल के प्रभागीय वनाधिकारी उमेश चंद्र तिवारी के अनुसार, जंगल रिहाइशी इलाकों से सटे हैं। इसी वजह से वन्यजीव आबादी की ओर आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि वन विभाग की टीमों को अलर्ट पर रखा गया है।
विभाग आबादी से लगे क्षेत्रों में घनी झाड़ियों की कटाई करा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसे स्थानों को कम करना है, जहां गुलदार छिप सकते हैं। इसके साथ ही ग्रामीणों के बीच जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है, ताकि वे वन्यजीवों की गतिविधियों को लेकर सतर्क रहें।
आगे की चुनौती
इस वर्ष होने वाली गुलदार गणना से राज्य में इनकी मौजूदा संख्या का पता चलेगा। इसके बाद आबादी और मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़े हालात का आकलन किया जा सकेगा। फिलहाल वन विभाग की कार्रवाई झाड़ियों की कटाई, निगरानी और ग्रामीणों को जागरूक करने तक केंद्रित है।
निष्कर्ष
नैनीताल से लगे तराई क्षेत्र में जंगल और गांवों की नजदीकी गुलदारों के साथ संघर्ष का खतरा बढ़ा रही है। वर्ष 2022 में राज्य में 3,115 गुलदार दर्ज हुए थे और इस वर्ष नई गणना होनी है। वन विभाग ने निगरानी, झाड़ियों की कटाई और जागरूकता अभियान शुरू किए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. उत्तराखंड में गुलदारों की पिछली गणना कब हुई थी?
वर्ष 2022 में राज्य में गुलदारों की पिछली गणना हुई थी। इसमें 3,115 गुलदार दर्ज किए गए थे।
Q. गुलदारों की नई गणना कब होनी है?
इस वर्ष राज्य में गुलदारों की दोबारा गणना की जानी है।
Q. वर्ष 2000 के बाद गुलदारों के हमलों में कितने लोगों की मौत हुई?
वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद से गुलदारों के हमलों में 567 लोगों की मौत बताई गई है।
Q. गुलदारों को कानून के तहत क्या दर्जा मिला है?
गुलदार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की शेड्यूल-1 श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी में उन्हें सर्वोच्च कानूनी संरक्षण मिलता है।
Q. तराई सेंट्रल वन प्रभाग में वन विभाग क्या कर रहा है?
विभाग ने टीमों को अलर्ट पर रखा है। आबादी से लगी झाड़ियों की कटाई और ग्रामीणों के बीच जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
Q. तराई सेंट्रल वन प्रभाग किन जिलों से सटा है?
यह वन प्रभाग नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिलों से सटा हुआ है।









