उत्तराखंड के चमोली जिले में तिब्बत सीमा के पास बसे द्रोणागिरी गांव की रामलीला बाकी जगहों से अलग है। यहां भगवान राम की पूजा होती है, लेकिन भगवान हनुमान का मंचन नहीं किया जाता। गांव में हनुमान का नाम तक नहीं लिया जाता।
द्रोणागिरी में करीब 50 भोटिया परिवार रहते हैं। कुछ समय पहले तक ग्रामीणों को सड़क तक पहुंचने के लिए 12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। उनके लिए द्रोणागिरी पर्वत केवल पहाड़ या प्राकृतिक दृश्य नहीं है। वह उनके इष्ट देवता हैं, जो खेतों, मवेशियों और बच्चों की रक्षा करते हैं।
ग्रामीणों की मान्यता है कि जब लक्ष्मण जीवन-मरण की स्थिति में थे, तब भगवान हनुमान संजीवनी बूटी की तलाश में द्रोणागिरी पर्वत तक आए थे। बूटी की पहचान न कर पाने पर उन्होंने पर्वत का एक हिस्सा तोड़कर अपने साथ ले लिया। दुनिया इस प्रसंग को भक्ति और समर्पण से जोड़कर देखती है, लेकिन द्रोणागिरी के लोग इसे अपने देवता को पहुंची चोट के रूप में याद करते हैं।
इसी मान्यता का असर गांव की रामलीला पर भी दिखता है। आमतौर पर उत्तराखंड के कई गांवों में रामलीला मई और जून में होती है। गर्मी की छुट्टियों में दिल्ली में काम करने वाला बेटा, देहरादून में पढ़ने वाली बेटी और साल में एक बार आने वाला रिश्तेदार गांव लौटता है। नवरात्र और दशहरे के आसपास भी रामलीला का दौर लौटता है। ठंडी रातों में लोग शॉल ओढ़कर घंटों मंचन देखते हैं।
लेकिन द्रोणागिरी की रामलीला केवल 3 दिन चलती है। इसमें भगवान राम का जन्म, माता सीता से उनका विवाह और उनका राज्याभिषेक दिखाया जाता है। भगवान हनुमान से जुड़े सभी दृश्य इसमें शामिल नहीं किए जाते। इस तरह गांव भगवान राम के प्रति आस्था रखता है, लेकिन अपने पर्वत को नुकसान पहुंचाने की मान्यता के कारण हनुमान को स्वीकार नहीं करता।
पहाड़ों से बदलता रिश्ता
द्रोणागिरी की यह परंपरा उस गहरे रिश्ते की याद दिलाती है, जिसमें पहाड़ स्थानीय लोगों के लिए जमीन, जंगल और रास्ते से कहीं अधिक मायने रखते हैं। इसी संदर्भ में उत्तराखंड में विकास के नाम पर हो रहे निर्माण और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल पर सवाल उठते हैं।
एक आरटीआई जवाब के मुताबिक, केवल भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने उत्तराखंड में राजमार्ग बनाने और चौड़ा करने के लिए 10 साल में 83,000 से ज्यादा पेड़ कटवाए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2023-24 के बीच राज्य में गैर-वन उपयोग के लिए 64.71 वर्ग किलोमीटर वन भूमि दी गई।
स्रोत सामग्री में नदियों से रेत और पत्थर के लिए अवैध खनन, खेतों और जंगलों को छोटे भूखंडों में बांटकर बेचने और कमजोर ढलानों पर होटल बनाने का भी उल्लेख है। इन गतिविधियों ने पहाड़ों की स्थिरता और स्थानीय जीवन के साथ विकास के संतुलन पर बहस तेज की है।
जोशीमठ का उदाहरण
द्रोणागिरी से घाटी में नीचे जोशीमठ का संकट भी इसी चिंता को सामने लाता है। इसरो के उपग्रहों ने 27 दिसंबर 2022 से 8 जनवरी 2023 के बीच 12 दिनों में शहर के 5.4 सेंटीमीटर धंसने की जानकारी दर्ज की थी।
21 जनवरी 2023 तक जिला प्रशासन ने 863 इमारतों में दिखाई देने वाली दरारें पाई थीं। इनमें से 181 इमारतों को असुरक्षित घोषित किया गया। कई घरों पर लाल निशान लगाए गए और परिवार अपने दादा-दादी के बनाए घरों से जरूरी सामान लेकर बाहर निकलने को मजबूर हुए।
द्रोणागिरी के लोग पर्वत का एक हिस्सा ले जाने की मान्यता को आज भी नहीं भूले हैं। इसी दृष्टि से देखें तो पेड़ों की कटाई, वन भूमि का इस्तेमाल और ढलानों पर बढ़ता निर्माण केवल विकास की गतिविधियां नहीं रह जाते। वे पहाड़ और उस पर निर्भर लोगों के रिश्ते को बदलने वाले फैसले बन जाते हैं।
निष्कर्ष
द्रोणागिरी की रामलीला बताती है कि स्थानीय समुदायों के लिए पर्वत आस्था, सुरक्षा और जीवन का आधार हो सकते हैं। गांव की हनुमान-विहीन परंपरा के साथ पेड़ों की कटाई, वन भूमि के इस्तेमाल और जोशीमठ के धंसने के आंकड़े यह सवाल उठाते हैं कि विकास करते समय पहाड़ों की सहनशीलता और लोगों के रिश्ते को कितना महत्व दिया जा रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. द्रोणागिरी गांव कहां है?
द्रोणागिरी उत्तराखंड के चमोली जिले में तिब्बत सीमा के पास स्थित एक छोटा भोटिया गांव है।
Q. द्रोणागिरी में भगवान हनुमान की पूजा क्यों नहीं होती?
ग्रामीण मानते हैं कि संजीवनी की तलाश में भगवान हनुमान उनके आराध्य द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा ले गए थे। इसलिए यहां हनुमान की पूजा नहीं होती और उनका नाम भी नहीं लिया जाता।
Q. द्रोणागिरी की रामलीला कितने दिन चलती है?
द्रोणागिरी की रामलीला 3 दिन चलती है। इसमें भगवान राम का जन्म, माता सीता से विवाह और राज्याभिषेक दिखाया जाता है।
Q. द्रोणागिरी में करीब कितने परिवार रहते हैं?
गांव में करीब 50 भोटिया परिवार रहते हैं।
Q. द्रोणागिरी के लोगों को सड़क तक पहुंचने के लिए कितनी दूरी तय करनी पड़ती थी?
कुछ समय पहले तक ग्रामीणों को सड़क तक पहुंचने के लिए 12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
Q. उत्तराखंड में एनएचएआई से जुड़ी पेड़ों की कटाई का आंकड़ा क्या है?
आरटीआई जवाब के अनुसार, राजमार्ग बनाने और चौड़ा करने के लिए 10 साल में 83,000 से ज्यादा पेड़ काटे गए।
Q. उत्तराखंड में कितनी वन भूमि गैर-वन उपयोग के लिए दी गई?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2023-24 के बीच 64.71 वर्ग किलोमीटर वन भूमि गैर-वन उपयोग के लिए दी गई।
Q. जोशीमठ में धंसने और इमारतों की दरारों से जुड़े आंकड़े क्या हैं?
इसरो ने 27 दिसंबर 2022 से 8 जनवरी 2023 के बीच 12 दिनों में 5.4 सेंटीमीटर धंसने की जानकारी दर्ज की। 21 जनवरी 2023 तक 863 इमारतों में दरारें मिलीं और 181 को असुरक्षित घोषित किया गया।













