दिवाली के आसपास उल्लुओं के अवैध शिकार और पकड़ने का खतरा बढ़ जाता है। मान्यता है कि तांत्रिक अनुष्ठान में उल्लू की बलि देने से धन मिल सकता है। इसी अंधविश्वास के चलते जंगलों के साथ शहरों के पार्कों में भी रात के समय उल्लुओं की तलाश की जाती है।

हरिद्वार के वन क्षेत्रों और राजाजी टाइगर रिजर्व में इस दिवाली निगरानी बढ़ाई गई है। वन विभाग ने रात की गश्त और त्वरित प्रतिक्रिया दल तैनात किए हैं। इन इलाकों में उल्लुओं के शिकार और अवैध पकड़ पर नजर रखी जा रही है।

हालांकि, खतरा केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। शहरों के पार्क और दूसरे हरित क्षेत्र भी उल्लुओं का ठिकाना होते हैं। रात में इन जगहों पर उनकी तलाश किए जाने से वे आसानी से शिकारियों के निशाने पर आ सकते हैं।

अंधविश्वास और उल्लुओं के संरक्षण का विरोधाभास

उल्लू को उलूक नाम से भी जाना जाता है और उसे देवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। इसके बावजूद धन पाने की उम्मीद में उसी पक्षी को नुकसान पहुंचाने की धारणा प्रचलित है। धार्मिक आस्था और इस हिंसक अंधविश्वास के बीच यही सबसे बड़ा विरोधाभास है।

यह केवल किसी विश्वास से जुड़ा मामला नहीं है। ट्रैफिक इंडिया की 2010 की रिपोर्ट में भारत में उल्लुओं को अवैध रूप से पकड़ने और उनके व्यापार का दस्तावेजीकरण किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में ज्ञात 30 प्रजातियों में से 15 प्रजातियां इस व्यापार में दर्ज हुई थीं।

कानून और पर्यावरण में भूमिका

भारत की सभी स्थानीय उल्लू प्रजातियां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित हैं। इसका मतलब है कि उन्हें पकड़ना, उनका व्यापार करना या उन्हें नुकसान पहुंचाना संरक्षण कानून के दायरे में आता है।

उल्लू पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। वे चूहों की संख्या नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसलिए उनका नुकसान केवल एक पक्षी के शिकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्राकृतिक संतुलन पर भी असर डाल सकता है।

हरिद्वार के वन क्षेत्रों और राजाजी टाइगर रिजर्व में तैनात गश्ती दलों के साथ शहरों के पार्कों पर निगरानी भी जरूरी बनी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वन विभाग ने दिवाली के दौरान निगरानी और त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था की है।

निष्कर्ष

दिवाली पर उल्लुओं को तांत्रिक अनुष्ठानों के नाम पर निशाना बनाए जाने का खतरा वास्तविक है। हरिद्वार और राजाजी टाइगर रिजर्व में वन विभाग की गश्त बढ़ाई गई है, लेकिन शहरों के पार्कों और हरित क्षेत्रों पर ध्यान देना भी जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. दिवाली पर उल्लुओं को खतरा क्यों बढ़ जाता है?

अंधविश्वास के कारण कुछ लोग तांत्रिक अनुष्ठानों में उल्लू की बलि देने से धन मिलने की धारणा रखते हैं। इसी वजह से उल्लुओं को पकड़ने और उनका शिकार करने का खतरा बढ़ता है।

Q. किन जगहों पर निगरानी बढ़ाई गई है?

हरिद्वार के वन क्षेत्रों और राजाजी टाइगर रिजर्व में वन विभाग ने निगरानी बढ़ाई है। वहां रात की गश्त और त्वरित प्रतिक्रिया दल तैनात किए गए हैं।

Q. क्या शहरों के पार्क भी सुरक्षित हैं?

नहीं। उल्लू शहरों के पार्कों और हरित क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं, इसलिए ये जगहें भी शिकार के खतरे से बाहर नहीं हैं।

Q. उल्लू को किस देवी का वाहन माना जाता है?

उल्लू, जिसे उलूक भी कहा जाता है, देवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है।

Q. उल्लुओं को कौन-सा कानूनी संरक्षण मिला है?

भारत की सभी स्थानीय उल्लू प्रजातियां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित हैं।

Q. उल्लू पर्यावरण के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?

उल्लू पारिस्थितिकी तंत्र में चूहों की संख्या नियंत्रित करने में मदद करते हैं।