जर्मनी भारत के साथ प्रस्तावित पनडुब्बी सौदे पर हस्ताक्षर के लिए तैयार है। जर्मन राजदूत-मनोनीत डॉ. जैस्पर वीक ने बुधवार को बताया कि जर्मन पक्ष ने सरकारी समझौते समेत सभी संबंधित दस्तावेज मंजूर कर दिए हैं। अब प्रस्ताव भारत की मंजूरी प्रक्रियाओं के पूरे होने का इंतजार कर रहा है।
यह सौदा प्रोजेक्ट 75(I) के तहत प्रस्तावित है। इसमें भारत में 6 एडवांस पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने की योजना है। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) जर्मन शिपबिल्डर थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ मिलकर इनका निर्माण करेगा।
भारत की मंजूरी क्यों अहम है
प्रस्ताव को भारतीय स्तर पर कई प्रक्रियाओं से गुजरना है। इनमें कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी CCS की मंजूरी भी शामिल है। इन स्वीकृतियों के बाद ही दोनों पक्ष औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकेंगे।
प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 70,000 से 90,000 करोड़ रुपये के बीच बताई गई है। यह रिपोर्टेड मूल्यांकन पर आधारित आंकड़ा है। इतनी बड़ी रक्षा परियोजना के कारण मंजूरी प्रक्रिया में सावधानी बरती जा रही है।
पनडुब्बियों में क्या खास होगा
प्रोजेक्ट 75(I) का लक्ष्य एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) से लैस पनडुब्बियां हासिल करना है। यह तकनीक पनडुब्बियों को बैटरी रिचार्ज के लिए सतह पर आए बिना ज्यादा समय तक पानी के अंदर रहने में मदद करती है। इससे उनकी युद्ध क्षमता और छिपकर काम करने की क्षमता बढ़ सकती है।
एमडीएल और टीकेएमएस ने जून 2023 में सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। औपचारिक सौदे पर बातचीत सितंबर 2025 में शुरू हुई थी। प्रस्तावित निर्माण भारत की नौसेना की पानी के अंदर क्षमता मजबूत करने के साथ घरेलू पनडुब्बी निर्माण विशेषज्ञता बढ़ाने पर भी केंद्रित है।
भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग पर असर
इस साझेदारी में तकनीक हस्तांतरण, स्वदेशी निर्माण और संयुक्त विकास के अवसर शामिल हैं। डॉ. वीक ने रक्षा-औद्योगिक सहयोग को भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी का जरूरी हिस्सा बताया है। उनके अनुसार, पनडुब्बी कार्यक्रम व्यापक औद्योगिक सहयोग का आधार बन सकता है।
ड्रोन, मानवरहित सिस्टम और एडवांस सेंसर जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावना बताई गई है। परियोजना आगे बढ़ने पर एमडीएल की निर्माण क्षमता का इस्तेमाल होगा और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
# आगे क्या होगा
भारतीय आंतरिक मंजूरियां पूरी होने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। इसके बाद निर्माण कार्य शुरू हो सकेगा। तकनीक हस्तांतरण सफल रहने पर भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता और आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
जर्मनी की ओर से दस्तावेज मंजूर होने के बाद प्रोजेक्ट 75(I) अब भारतीय स्वीकृतियों के चरण में है। CCS समेत मंजूरियां मिलने पर यह सौदा नौसेना की पानी के अंदर क्षमता और भारत-जर्मनी औद्योगिक सहयोग के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. प्रोजेक्ट 75(I) क्या है?
प्रोजेक्ट 75(I) भारतीय नौसेना के लिए 6 एडवांस पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने की योजना है।
Q. पनडुब्बियां कौन बनाएगा?
मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स मिलकर इनका निर्माण करेंगे।
Q. सौदे की अनुमानित लागत कितनी है?
प्रस्तावित लागत 70,000 से 90,000 करोड़ रुपये के बीच बताई गई है।
Q. भारत की कौन-सी मंजूरी बाकी है?
कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी समेत भारतीय आंतरिक मंजूरी प्रक्रियाएं पूरी होना बाकी है।
Q. एआईपी तकनीक क्या करती है?
एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन पनडुब्बी को बैटरी रिचार्ज के लिए सतह पर आए बिना लंबे समय तक पानी के अंदर रहने में मदद करती है।
Q. जर्मनी ने क्या मंजूर किया है?
जर्मन पक्ष ने सरकारी समझौते समेत प्रस्ताव से जुड़े सभी दस्तावेज मंजूर कर दिए हैं।
Q. समझौते के बाद अगला कदम क्या होगा?
भारतीय मंजूरियां पूरी होने के बाद दोनों पक्ष औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं।







