जर्मनी में रहने वाले उत्तराखंडियों को संगठित करने की दिशा में बर्लिन में नई पहल हुई। 3 अक्टूबर को उत्तराखंड प्रवासी परिषद, जर्मनी ने उत्तराखंड प्रवासी सम्मेलन कराया। इसमें बर्लिन और ब्रांडेनबर्ग में रह रहे उत्तराखंड के लोग शामिल हुए।

सम्मेलन में देहरादून, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, हल्द्वानी, रुद्रपुर, लैंसडाउन, नैनीताल और टिहरी से जुड़े प्रवासी पहुंचे। कार्यक्रम में आईटी, चिकित्सा और दूसरे पेशों से जुड़े लोगों के साथ छात्र भी मौजूद रहे।

कई प्रवासी लंबे समय बाद एक-दूसरे से मिले। बातचीत में गांव, पहाड़ और बचपन से जुड़ी यादें साझा की गईं। इस दौरान यह भी चर्चा हुई कि जर्मनी में वर्षों से रहने के बावजूद उत्तराखंडियों का ऐसा सामूहिक मंच पहले क्यों नहीं बन सका।

परिषद के उद्देश्य और कार्यकारिणी

परिषद की मुख्य कार्यकारिणी में देहरादून की डॉ. योजना साह जैन, बागेश्वर के सुंदर टँगरिया और टिहरी गढ़वाल के करम सिंह शामिल हैं। परिषद का उद्देश्य जर्मनी में उत्तराखंड की संस्कृति, भाषा और परंपराओं को जीवित रखना बताया गया।

डॉ. योजना साह जैन के अनुसार, परिषद नई पीढ़ी को उत्तराखंड की जड़ों से जोड़ने और जर्मनी में भारतीय समुदाय के लिए सकारात्मक योगदान देने पर भी काम करेगी। आगे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ सामाजिक और सामुदायिक सहयोग के लिए मंच तैयार करने की योजना है।

संस्कृति और इतिहास पर क्विज

कार्यक्रम में उत्तराखंड की संस्कृति और इतिहास पर आधारित क्विज कराई गई। इसे सुंदर टँगरिया ने तैयार किया था। प्रतिभागियों ने उत्साह के साथ सवालों के जवाब दिए और राज्य से जुड़ी अपनी जानकारी साझा की।

करम सिंह ने कहा कि लक्ष्य ऐसा मजबूत समुदाय बनाना है, जिसमें जर्मनी में रहने वाला हर उत्तराखंडी अपनी पहचान और जड़ों से जुड़ाव महसूस करे।

पहाड़ी गीतों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम

सम्मेलन में चर्चाओं के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुआ। प्रवासियों ने पारंपरिक पहाड़ी गीतों पर गाना और नृत्य किया। बर्लिन में ‘बेडु पाको बारा मासा’ और ‘हाय तेरी रुमाला’ जैसे गीतों की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में उत्तराखंड का रंग भर दिया।

विदेश में इन गीतों के बीच प्रवासियों ने अपने गांव और पहाड़ से जुड़ी यादें महसूस कीं। कार्यक्रम में संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत पर भी विचार रखा गया।

दूसरे शहरों में विस्तार का संकल्प

सम्मेलन के समापन पर परिषद को मजबूत करने और जर्मनी के अलग-अलग शहरों में रह रहे उत्तराखंडियों को इससे जोड़ने का संकल्प लिया गया। उत्तराखंड की भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जर्मनी सहित दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने पर भी सहमति बनी।

निष्कर्ष

बर्लिन सम्मेलन ने जर्मनी में रह रहे उत्तराखंडियों को साझा मंच दिया। परिषद अब संस्कृति, सामुदायिक सहयोग और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में काम आगे बढ़ाने पर केंद्रित है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. उत्तराखंड प्रवासी सम्मेलन कहां आयोजित हुआ?

यह सम्मेलन जर्मनी के बर्लिन में आयोजित हुआ। इसमें बर्लिन और ब्रांडेनबर्ग में रहने वाले उत्तराखंडी शामिल हुए।

Q. सम्मेलन का आयोजन किस संस्था ने किया?

कार्यक्रम उत्तराखंड प्रवासी परिषद, जर्मनी की ओर से आयोजित किया गया।

Q. सम्मेलन में किन क्षेत्रों से जुड़े लोग पहुंचे?

देहरादून, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, हल्द्वानी, रुद्रपुर, लैंसडाउन, नैनीताल और टिहरी से जुड़े लोग पहुंचे।

Q. परिषद का मुख्य उद्देश्य क्या है?

परिषद जर्मनी में उत्तराखंड की संस्कृति, भाषा और परंपराओं को जीवित रखने पर काम करना चाहती है। नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना भी इसका उद्देश्य है।

Q. कार्यक्रम में कौन-से सांस्कृतिक आयोजन हुए?

उत्तराखंड की संस्कृति और इतिहास पर क्विज आयोजित हुई। प्रवासियों ने ‘बेडु पाको बारा मासा’ और ‘हाय तेरी रुमाला’ जैसे पहाड़ी गीतों पर गाना और नृत्य किया।

Q. परिषद को लेकर आगे क्या संकल्प लिया गया?

जर्मनी के अलग-अलग शहरों में रहने वाले उत्तराखंडियों को परिषद से जोड़ने का संकल्प लिया गया। संस्कृति, भाषा और परंपराओं को दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने पर भी सहमति बनी।