उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में रामपुर तिराहा कांड सबसे गंभीर घटनाओं में गिना जाता है। 1-2 अक्टूबर 1994 की रात मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों को रोका गया। इसके बाद पुलिस कार्रवाई, महिलाओं के साथ हिंसा और बलात्कार के आरोपों की जांच राष्ट्रीय महिला आयोग ने की।

घटना के 4 दिन बाद आयोग ने बोनोज सेनापति और इंदिरा मिश्रा की 2 सदस्यीय टीम मुजफ्फरनगर भेजी। टीम ने रामपुर तिराहा, पास के रामपुर गांव और पुलिस लाइंस का दौरा किया। कुछ पीड़ितों ने रामपुर गांव में शरण ली थी, जबकि गिरफ्तारी के बाद करीब 47 महिलाओं को पुलिस लाइंस लाया गया था।

टीम ने 60 से 65 लोगों के बयान सुने। इनमें पीड़ित, स्थानीय लोग और अन्य संबंधित लोग शामिल थे। जिला प्रशासन ने घटना में किसी गंभीर ज्यादती से इनकार किया। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का कहना था कि बसों को हथियारों की जांच के लिए रोका गया था। उनके अनुसार, आंदोलनकारियों के हिंसक होने के बाद लाठीचार्ज हुआ और 5 आंदोलनकारी तथा 10 पुलिसकर्मी घायल हुए।

राष्ट्रीय महिला आयोग की जांच में क्या सामने आया

राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट ने प्रशासन के दावे से अलग तस्वीर पेश की। रिपोर्ट के अनुसार, बसों के भीतर और सड़क पर मौजूद निहत्थी महिलाओं पर डंडों से हमला किया गया। 2 मामलों में बलात्कार की बात दर्ज की गई। इनमें एक मामले में एक से अधिक पुलिसकर्मियों के शामिल होने का आरोप था।

रिपोर्ट में पुलिस कार्रवाई को अनियंत्रित हिंसा बताया गया। इसमें महिलाओं की पिटाई, उनके साथ बदसलूकी, कपड़े फाड़ने और पैसे वसूलने के आरोप दर्ज थे। एक महिला के भागने की कोशिश के दौरान सिर में गोली लगने की बात भी रिपोर्ट में कही गई।

महिलाओं ने जांच टीम को बताया कि पुलिसकर्मियों ने उत्तराखंड की मांग को लेकर उनका मजाक उड़ाया और मारपीट की। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिला प्रशासन और पुलिस का रवैया बदले की भावना जैसा दिखाई देता था।

जांच टीम ने हथियारों की तलाशी के दावे पर भी सवाल उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, अगर मकसद हथियारों की जांच था, तो आंदोलनकारियों को गोपेश्वर, टिहरी या देहरादून से आगे बढ़ने से पहले रोका जा सकता था। मुजफ्फरनगर तक पहुंचने देने का कारण रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं बताया गया।

कार्रवाई और सजा में लंबा अंतर

आयोग ने जिम्मेदार पुलिसकर्मियों और जिला अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश की। रिपोर्ट में कहा गया कि अधिकारियों के प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन के बिना इतनी गंभीर घटनाएं संभव नहीं थीं। पर्याप्त संख्या में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती न होने को भी प्रशासन की बड़ी कमी बताया गया।

रिपोर्ट ने पीड़ित महिलाओं को हुए नुकसान का मुआवजा देने की सिफारिश की। इसमें चेतावनी दी गई कि पुलिस को केवल आपसी समर्थन के आधार पर खुली छूट देने से पूरी व्यवस्था कमजोर हो सकती है।

उस समय के अखबारी विवरणों में 15 लोगों की मौत, 100 से अधिक लोगों के घायल होने और करीब 150 लोगों के लापता होने की बातें सामने आई थीं। कुछ दावों में शवों को खेतों में दफनाकर घटना छिपाने की बात भी कही गई थी। ये विवरण उस समय की रिपोर्टिंग और दावों के रूप में सामने आए थे।

घटना के करीब 30 साल बाद 2024 में पहली सजा हुई। 2 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद सुनाई गई। हालांकि, राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराए गए अधिकांश लोगों को सजा नहीं मिल सकी।

निष्कर्ष

रामपुर तिराहा कांड उत्तराखंड आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और महिलाओं के खिलाफ गंभीर आरोपों की याद दिलाता है। राष्ट्रीय महिला आयोग की जांच, लंबे समय बाद हुई 2024 की सजा और बाकी मामलों में कार्रवाई का अभाव इस घटना की जटिलता को सामने रखते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. रामपुर तिराहा कांड कब हुआ था?

यह घटना 1-2 अक्टूबर 1994 की रात मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर हुई थी।

Q. राष्ट्रीय महिला आयोग ने जांच कब शुरू की?

घटना के 4 दिन बाद आयोग ने बोनोज सेनापति और इंदिरा मिश्रा की 2 सदस्यीय टीम भेजी थी।

Q. आयोग की टीम ने कितने लोगों के बयान सुने?

टीम ने 60 से 65 लोगों से बातचीत की थी।

Q. पुलिस लाइंस में कितनी महिलाओं को लाया गया था?

गिरफ्तारी के बाद करीब 47 महिलाओं को पुलिस लाइंस लाया गया था।

Q. जांच रिपोर्ट में महिलाओं के साथ किस तरह की ज्यादती का आरोप था?

रिपोर्ट में मारपीट, बदसलूकी, कपड़े फाड़ने, पैसे वसूलने और 2 मामलों में बलात्कार के आरोप दर्ज थे।

Q. 2024 में क्या सजा हुई?

2024 में 2 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद सुनाई गई।