चंपावत के टनकपुर क्षेत्र में भूजल को लेकर हुए अध्ययन में 17 जांच स्थलों में 14 पर जमीन के नीचे पानी मौजूद होने की संभावना के संकेत मिले हैं। इन स्थानों पर पानी वाली परत की गहराई 29.84 मीटर से 142.27 मीटर तक पाई गई। इससे साफ है कि टनकपुर में भूजल हर जगह एक जैसी गहराई पर नहीं है।
यह अध्ययन केंद्रीय भूजल बोर्ड से जुड़े डॉ. सोमवीर सिंह ने किया है। इसमें जमीन के अंदर की परतों का पता लगाने वाली विशेष जांच तकनीक का इस्तेमाल किया गया। जांच के दौरान अलग-अलग स्थानों की मिट्टी और चट्टानों की संरचना से जुड़ी जानकारी को भी शामिल किया गया, ताकि भूजल की संभावित स्थिति समझी जा सके।
पानी वाली परतों की मोटाई और गहराई
अध्ययन में जमीन के नीचे पानी जमा करने वाली परतों की मोटाई 13.12 से 118.65 मीटर तक मिली। इसका औसत 52.12 मीटर रहा। मध्य, उत्तर-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में अपेक्षाकृत मोटी पानी वाली परतें पाई गईं।
इन परतों की औसत गहराई 87.62 मीटर रही। सबसे ज्यादा गहराई पर पानी के संकेत चांदनी गांव के पास जांचे गए स्थान पर मिले। इसके उलट बनबसा के पास पानी अपेक्षाकृत कम गहराई पर मिला।
इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि किसी इलाके में सतह की स्थिति देखकर भूजल की गहराई का अनुमान लगाना सही नहीं होगा। अलग-अलग स्थानों पर जमीन के नीचे की संरचना बदलने से पानी की स्थिति भी बदल सकती है।
मिट्टी और चट्टानों की बनावट का असर
अध्ययन में टनकपुर क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों में मिट्टी और पत्थरों की परतों में अंतर पाया गया। टनकपुर-1 और टनकपुर-2 गांवों की ओर बड़े पत्थर, बजरी, कंकड़, गिट्टी और रेतीली मिट्टी की अलग-अलग परतें मिलीं।
उत्तर-पश्चिमी हिस्से के चांदनी क्षेत्र में भी रेत के साथ बड़े पत्थर, कंकड़ और गिट्टी की मोटी परतें पाई गईं। जमीन के नीचे मौजूद इन परतों का असर इस बात पर पड़ता है कि बारिश का पानी कितनी आसानी से मिट्टी में उतर सकता है और कहां जमा हो सकता है।
अध्ययन के अनुसार, जिन स्थानों पर चट्टानों में टूटन या प्राकृतिक दरारें हैं, वहां पानी जमा होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी दरारें बारिश के पानी को जमीन के अंदर जाने का रास्ता देती हैं। इसके बाद पानी जमीन के नीचे मौजूद परतों में जमा हो सकता है।
दक्षिणी भाबर और तलहटी में ज्यादा संभावना
अध्ययन में टनकपुर के दक्षिणी भाबर और पहाड़ की तलहटी वाले इलाकों को भूजल की तलाश के लिहाज से अपेक्षाकृत संभावनाशील माना गया है। यहां मोटी मिट्टी-पत्थर वाली परतें मौजूद हैं और बारिश का पानी जमीन के अंदर पहुंच सकता है।
शारदा (महाकाली) नदी का पानी भी इस क्षेत्र में भूजल को दोबारा भरने में मदद करता है। बारिश और नदी से आने वाला पानी जमीन के अंदर पहुंचकर वहां मौजूद भूजल भंडार को भरने में योगदान दे सकता है।
बोरवेल के लिए आगे की जांच जरूरी
अध्ययन के आधार पर मोटी पानी वाली परतों और टूटी-फूटी, दरार वाली चट्टानों वाले इलाकों को भूजल की तलाश के लिए उपयोगी माना जा सकता है। हालांकि, केवल इस अध्ययन के आधार पर किसी खास स्थान पर कुआं या बोरवेल खोदने का फैसला नहीं किया जा सकता।
किसी जगह पानी की सही स्थिति जानने के लिए अतिरिक्त जांच, बोरहोल और पानी निकालकर उसकी क्षमता परखने जैसी प्रक्रियाएं जरूरी होंगी। इसकी जरूरत इसलिए भी है क्योंकि थोड़ी दूरी पर जमीन के नीचे की परतें और पानी की गहराई बदल सकती है।
बारिश का पानी जमीन में पहुंचाने पर जोर
भूजल निकालने के साथ उसे दोबारा जमीन के अंदर पहुंचाना भी जरूरी है। अध्ययन में उन इलाकों में बारिश का पानी जमीन में उतारने के उपाय करने की सलाह दी गई है, जहां पानी तेजी से बहकर निकल जाता है।
इसके लिए चेक डैम, रिचार्ज पिट और पानी को जमीन में पहुंचाने वाले छोटे जलाशय बनाए जा सकते हैं। इन उपायों से बारिश का पानी सीधे बहने के बजाय जमीन के अंदर पहुंच सकता है और भूजल का स्तर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
अध्ययन की सीमा क्या है
इस अध्ययन में सिर्फ 17 स्थानों की जांच की गई है। इसलिए इसके आधार पर पूरे टनकपुर क्षेत्र के हर हिस्से में पानी की सटीक गहराई या मात्रा तय नहीं की जा सकती।
अध्ययन से जमीन के नीचे पानी की स्थिति और संभावित क्षेत्रों का व्यापक अनुमान मिला है। किसी छोटे इलाके में पानी की सही गहराई और उपलब्धता जानने के लिए ज्यादा स्थानों पर जांच करनी होगी। इसके साथ बोरहोल, पानी निकालकर क्षमता जांचने और जमीन के अंदर की संरचना समझने वाली अन्य तकनीकों की भी जरूरत होगी।
निष्कर्ष
टनकपुर में 17 स्थानों की जांच के दौरान 14 जगह भूजल की संभावना के संकेत मिले हैं। पानी वाली परतों की गहराई और मोटाई में काफी अंतर है। इसलिए किसी भी जगह बोरवेल या कुआं खोदने से पहले स्थानीय स्तर पर विस्तृत जांच जरूरी होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. टनकपुर में कितने स्थानों पर भूजल के संकेत मिले?
17 जांच स्थलों में 14 जगह जमीन के नीचे पानी मौजूद होने की संभावना के संकेत मिले।
Q. पानी वाली परतें कितनी गहराई पर मिलीं?
इन परतों की गहराई 29.84 मीटर से 142.27 मीटर तक मिली।
Q. पानी जमा करने वाली परतों की मोटाई कितनी थी?
इन परतों की मोटाई 13.12 से 118.65 मीटर तक मिली। औसत मोटाई 52.12 मीटर रही।
Q. सबसे गहरे पानी के संकेत कहां मिले?
सबसे ज्यादा गहराई वाले पानी के संकेत चांदनी गांव के पास जांचे गए स्थान पर मिले।
Q. बनबसा के पास पानी की स्थिति कैसी मिली?
बनबसा के पास पानी अपेक्षाकृत कम गहराई पर मिला।
Q. क्या अध्ययन के आधार पर सीधे बोरवेल खोदा जा सकता है?
नहीं। इसके लिए अतिरिक्त जांच, बोरहोल और पानी निकालकर क्षमता जांचना जरूरी होगा।
Q. किन इलाकों में भूजल मिलने की संभावना ज्यादा बताई गई है?
दक्षिणी भाबर और पहाड़ की तलहटी वाले इलाकों में भूजल मिलने की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा बताई गई है।
Q. भूजल रिचार्ज के लिए क्या उपाय बताए गए हैं?
चेक डैम, रिचार्ज पिट और छोटे जलाशयों के जरिए बारिश का पानी जमीन में पहुंचाने के उपाय बताए गए हैं।









